श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  12.285.27-28 
अविद्या रागमोहौ च प्रमाद: स्तब्धता भयम्॥ २७॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोह: स्वप्नतन्द्रिता।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणा:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
यदि अज्ञान, राग, मोह, प्रमाद, मूर्छा, भय, दरिद्रता, दीनता, मूर्छा, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि किसी भी प्रकार के दोष तुम्हें घेरे हुए हों, तो उन्हें तमोगुण के ही विविध रूप जानो।।27-28।।
 
If any kind of defect like ignorance, passion, infatuation, negligence, stupor, fear, poverty, meekness, fainting, dreams, sleep and laziness surround you, then know them as various forms of Tamoguna. 27-28.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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