श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 285: अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  12.285.19-20 
येन पश्यति तच्चक्षु: शृण्वती श्रोत्रमुच्यते।
जिघ्रती भवति घ्राणं रसती रसना रसान्॥ १९॥
स्पर्शनं स्पर्शती स्पर्शान् बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत्।
यदा प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति सा मन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
बुद्धि जिस इन्द्रिय से देखती है उसे दृष्टि या नेत्र कहते हैं। जब वह अपनी विशेष वृत्ति से सुनने लगती है, तो उसे कान कहते हैं। गंध का अनुभव करते समय वह नासिका बन जाती है। भोजन का स्वाद लेते समय उसे जिह्वा कहते हैं और स्पर्श का अनुभव करते समय उसे स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) कहते हैं। इस प्रकार बुद्धि बार-बार विकृत होती रहती है। जब वह किसी वस्तु के लिए प्रार्थना (याचना) करती है, तो वह मन बन जाती है।
 
The sense through which the intellect sees is called sight or eye. When it starts listening through its special instinct, it is called ear. While perceiving odour, it becomes nose. While tasting food, it is called tongue and while experiencing touch, it is called sense of touch (skin). In this way, the intellect is repeatedly distorted. When it prays (begs) for something, it becomes mind.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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