श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  12.284.98 
पञ्चालाय सिताङ्गाय नम: शमशमाय च।
नमश्चण्डिकघण्टाय घण्टायाघण्टघण्टिने॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
जो इस जगत् के रचयिता हैं, जो गौर वर्ण के शरीर वाले हैं और जो सदैव शान्त भाव से रहते हैं, जिनकी घण्टियों की ध्वनि शत्रुओं को भयभीत करती है और जो स्वयं घण्टों की ध्वनि और अनाहत ध्वनि के रूप में सुनाई देते हैं, उन महेश्वर को नमस्कार है ॥98॥
 
Salutations to Maheshwar, who is the artisan who created this world, who has a body of fair complexion and who always lives peacefully, whose sound of bells frightens the enemies and who himself is heard in the form of sound of bells and anahata sound. 98॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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