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mahabharat 12.284.92: आपका मुख विकृत है। आपकी जीभ तलवार के समान है। आपका मुख दाढ़ों से सुशोभित है। आपको कच्चे और पके फलों का गूदा आकर्षित करता है। आपको लौकी और वीणा विशेष प्रिय हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  12.284.92 
नमो विकृतवक्त्राय खड्गजिह्वाय दंष्ट्रिणे।
पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
आपका मुख विकृत है। आपकी जीभ तलवार के समान है। आपका मुख दाढ़ों से सुशोभित है। आपको कच्चे और पके फलों का गूदा आकर्षित करता है। आपको लौकी और वीणा विशेष प्रिय हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
 
Your face is deformed. Your tongue is like a sword. Your face is adorned with molars. You are attracted to the pulp of raw and ripe fruits. You are especially fond of the gourd and the veena. I salute you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)