श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  12.284.87 
नमोऽस्तु शयमानाय शयितायोत्थिताय च।
स्थिताय धावमानाय मुण्डाय जटिलाय च॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
आप ही सर्वज्ञ हैं जो समस्त प्राणियों के भीतर शयन करते हैं। प्रलयकाल में आप योगनिद्रा का आश्रय लेकर शयन करते हैं और सृष्टि के आरंभ में कल्प के अंत की निद्रा से जागते हैं। आप ब्रह्मरूप में सर्वत्र विद्यमान हैं और कालरूप में सदैव गतिशील रहते हैं। सिर मुंडाए हुए संन्यासी और जटाधारी तपस्वी भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। 87।
 
You are the omniscient person who sleeps inside all living beings. During the time of destruction, you sleep taking shelter of Yognidra and at the beginning of creation, you wake up from the sleep of the end of Kalpa. You are present everywhere in the form of Brahma and are always running in the form of time. The sannyasis who shave their heads and the ascetics with matted hair are also your forms. Salutations to you. 87.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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