श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  12.284.81 
नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च।
सूर्याय सूर्यमालाय सूर्यध्वजपताकिने॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
आपके स्वरूप की कहीं कोई बराबरी नहीं है, इसलिए आप निराकार हैं। अनेक रूप धारण करने के कारण आपको विरूप कहा जाता है। आप परम कल्याणकारी शिव हैं। आप सूर्य हैं, आप ही सौरमंडल में शोभायमान हैं। आप अपनी ध्वजा और पताका पर सूर्य का चिह्न धारण करते हैं। आपको नमस्कार है।
 
There is no equal to your form anywhere, therefore you are formless. Because you have taken many forms, you are called Virupa. You are the ultimate benefactor Shiva. You are the Sun, you are the one who looks beautiful in the solar system. You wear the symbol of the Sun on your flag and banner. Salutations to you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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