Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.284.58-60h: तब अनेक नेत्रों वाले और शत्रुओं को जीतने वाले महादेवजी प्राण और अपान वायु को अपने मुख से यत्नपूर्वक रोककर, सब दिशाओं में देखते हुए, सहस्रों सूर्यों के समान तेज धारण किए हुए, प्रलयकाल की अग्नि के समान तेजस्वी रूप धारण किए हुए, दक्ष के सामने खड़े हो गए और हँसकर बोले - 'प्रजापते! कहिए, आज मैं आपका कौन-सा कार्य सम्पन्न करूँ?' 58-59 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तब अनेक नेत्रों वाले और शत्रुओं को जीतने वाले महादेवजी प्राण और अपान वायु को अपने मुख से यत्नपूर्वक रोककर, सब दिशाओं में देखते हुए, सहस्रों सूर्यों के समान तेज धारण किए हुए, प्रलयकाल की अग्नि के समान तेजस्वी रूप धारण किए हुए, दक्ष के सामने खड़े हो गए और हँसकर बोले - 'प्रजापते! कहिए, आज मैं आपका कौन-सा कार्य सम्पन्न करूँ?' 58-59 1/2॥
Then Mahadev, the one with many eyes and the conqueror of the enemies, after diligently blocking the prana and apana vayu with his mouth, suddenly came out of the fire pit, gazing in all directions. He stood in front of Daksh, wearing the radiance of thousands of suns, with a form as bright as the fire of the Doomsday, and smilingly said - 'Prajapate! Tell me, what work should I complete for you today? 58-59 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥