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mahabharat 12.284.57: आज मैं उन महादेवजी की शरण लेता हूँ जो सम्पूर्ण जगत के अधिष्ठाता, पालक, महान् आत्मा, अनादि, नित्य, अपरिवर्तनशील और पूज्य परमेश्वर हैं॥57॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  12.284.57 
प्रपद्ये देवमीशानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।
महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगत: पतिम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
आज मैं उन महादेवजी की शरण लेता हूँ जो सम्पूर्ण जगत के अधिष्ठाता, पालक, महान् आत्मा, अनादि, नित्य, अपरिवर्तनशील और पूज्य परमेश्वर हैं॥57॥
 
'Today I take refuge in that Mahadevji who is the ruler, guardian, great soul, eternal, eternal, unchangeable and worshipable God of the entire world.' 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)