श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 49-50h
 
 
श्लोक  12.284.49-50h 
चकार भैरवं नादं सर्वभूतभयंकरम्॥ ४९॥
छित्त्वा शिरो वै यज्ञस्य ननाद च मुमोद च।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उसने ऐसी भयंकर गर्जना की कि सब प्राणियों के हृदय में भय उत्पन्न हो गया। फिर उसने यज्ञ का सिर काटकर बड़े जोर से सिंहनाद किया और अपने हृदय में हर्ष का अनुभव किया। 49 1/2॥
 
After that he roared so fiercely that it created fear in the hearts of all living beings. Then he cut off Yagya's head and made a loud lion roar and felt joy in his heart. 49 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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