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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  12.284.48-49h 
क्रीडन्ति विविधाकाराश्चिक्षिपु: सुरयोषित:।
रुद्रक्रोधात् प्रयत्नेन सर्वदेवै: सुरक्षितम्॥ ४८॥
तं यज्ञमदहच्छीघ्रं रुद्रकर्मा समन्तत:।
 
 
अनुवाद
नाना प्रकार के आकार वाले वे रुद्र खेल-कूद रहे थे और दिव्य अप्सराओं को दूर फेंक रहे थे। यद्यपि समस्त देवताओं ने मिलकर उस यज्ञ की रक्षा के लिए बहुत प्रयत्न किया, तथापि रुद्रदेव के क्रोध से प्रेरित रुद्रकर्मा वीरभद्र ने शीघ्र ही उसे सब ओर से जलाकर भस्म कर दिया।
 
Those Rudras of various shapes were playing and jumping and throwing the celestial nymphs away. Although all the gods together tried hard to protect that yajna, yet Rudrakarma Veerbhadra, inspired by the anger of Rudradev, soon burnt it to ashes from all sides. 48 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)