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mahabharat 12.284.42: बहुत से दरबारी, वायु और मन के समान वेग से इधर-उधर भागने लगे। कुछ लोग यज्ञ में प्रयुक्त पात्रों और दिव्य आभूषणों को टुकड़े-टुकड़े करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.284.42 
आधावन्ति प्रधावन्ति वायुवेगा मनोजवा:।
चूर्ण्यन्ते यज्ञपात्राणि दिव्यान्याभरणानि च॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
बहुत से दरबारी, वायु और मन के समान वेग से इधर-उधर भागने लगे। कुछ लोग यज्ञ में प्रयुक्त पात्रों और दिव्य आभूषणों को टुकड़े-टुकड़े करने लगे।
 
Many of the courtiers, as swift as the wind and the mind, began running here and there. Some were breaking into pieces the vessels and divine ornaments used in the yajna. 42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)