श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  12.284.36-37h 
ते निपेतुस्ततस्तूर्णं दक्षयज्ञविहिंसया।
भीमरूपा महाकाया: शतशोऽथ सहस्रश:॥ ३६॥
तत: किलकिलाशब्दैराकाशं पूरयन्निव।
 
 
अनुवाद
वे भयंकर रूप वाले विशाल रुद्र सैकड़ों और हजारों के समूह बनाकर दक्ष यज्ञ को नष्ट करने के लिए बड़े वेग से आगे बढ़े, मानो उनकी चिंघाड़ से आकाश गूंज रहा हो ॥36 1/2॥
 
Those gigantic Rudras with fearsome forms, forming groups of hundreds and thousands, rushed forward with great speed to destroy the Daksha Yagna, as if echoing the sky with their shrieks. ॥ 36 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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