श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.284.28 
श्रीभगवानुवाच
नात्मानं स्तौमि देवेशि पश्य मे तनुमध्यमे।
यं स्रक्ष्यामि वरारोहे यागार्थे वरवर्णिनि॥ २८॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान शिव ने कहा- देवेश्वरी! तनुमध्यामे! वररोहे! वरवर्णिनी! मैं अपनी स्तुति नहीं कर रहा हूँ। मेरी शक्ति देखो। उस वीर पुरुष को देखो, जिसे मैं उस यज्ञ का नाश करने के लिए उत्पन्न कर रहा हूँ, जिसके कारण तुम्हें कष्ट हुआ है।॥28॥
 
Sri Bhagwan Shiva said- Deveshwari! Tanumadhyame! Vararohe! Varavarnini! I am not praising myself. See my power. Look at the brave man whom I am creating to destroy the yagya due to which you have suffered. ॥28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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