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श्लोक 12.284.201-203  |
देवस्य च गुहस्यापि देव्या नन्दीश्वरस्य च।
बलिं सुविहितं कृत्वा दमेन नियमेन च॥ २०१॥
ततस्तु युक्तो गृह्णीयान्नामान्याशु यथाक्रमम्।
ईप्सितान् लभते सोऽर्थान् भोगान् कामांश्च मानव:॥ २०२॥
मृतश्च स्वर्गमाप्नोति तिर्यक्षु च न जायते।
इत्याह भगवान् व्यास: पराशरसुत: प्रभु:॥ २०३॥ |
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| अनुवाद |
| मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर शौच-संतोष आदि नियमों का पालन करते हुए महादेवजी, कार्तिकेय, पार्वती देवी और नंदिकेश्वर की विधिपूर्वक पूजा करे और फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमशः इन सहस्त्र नामों का जप करे। ऐसा करने से मनुष्य शीघ्र ही इच्छित वस्तुओं, सुखों और कामनाओं को प्राप्त कर लेता है और मृत्यु के बाद स्वर्गलोक में जाता है। उसे पशु-पक्षी आदि योनियों में जन्म नहीं लेना पड़ता। इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनंदन भगवान व्यासजी ने इस स्तोत्र का माहात्म्य बताया है। |
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| Man should keep his senses under control and follow the rules of defecation and satisfaction etc. and offer puja to Mahadevji, Kartikeya, Parvati Devi and Nandikeshwar in a proper manner and then concentrate and recite these thousand names respectively. By doing this, a person soon attains the desired things, pleasures and desires and goes to heaven after death. He does not have to take birth in the form of animals, birds etc. In this way, the all-powerful Parasharanandan Lord Vyasji has explained the greatness of this stotra. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दक्षप्रोक्तशिवसहस्रनामस्तवे चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनामस्तोत्रविषयक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८४॥
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