श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.284.2 
देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्ध: सर्वात्मक: प्रभु:।
प्रसादात् तस्य दक्षेण स यज्ञ: संधित: कथम्।
एतद् वेदितुमिच्छेयं तन्मे ब्रूहि यथातथम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
यह जानकर कि दक्ष के यज्ञ में मेरा न बुलाया जाना पार्वती के दुःख का कारण बना है, समस्त प्राणियों के आत्मा भगवान शंकर क्रोधित हो गए। फिर उनकी कृपा और प्रसन्नता से दक्ष-प्रजापति का यह यज्ञ किस प्रकार सम्पन्न हुआ? मैं यह वृत्तांत जानना चाहता हूँ। कृपया मुझे सत्य बताइए।॥ 2॥
 
Knowing that my not being invited to the sacrifice of Daksha has become the cause of Parvati's sorrow, Lord Shankar, who is the soul of all beings, became angry. Then how was this sacrifice of Daksha-Prajapati completed by his grace and pleasure? I want to know this story. Please tell me the truth.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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