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mahabharat 12.284.168: जो भगवान रात्रि में राहु के मुख में प्रवेश करके चन्द्रमा का अमृत पीकर स्वयं राहु बन जाते हैं और सूर्य को ग्रहण कर लेते हैं, वे मेरी रक्षा करें।   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  12.284.168 
प्रविश्य वदनं राहोर्य: सोमं पिबते निशि।
ग्रसत्यर्कं च स्वर्भानुर्भूत्वा मां सोऽभिरक्षतु॥ १६८॥
 
 
अनुवाद
जो भगवान रात्रि में राहु के मुख में प्रवेश करके चन्द्रमा का अमृत पीकर स्वयं राहु बन जाते हैं और सूर्य को ग्रहण कर लेते हैं, वे मेरी रक्षा करें।
 
May the God who enters the mouth of Rahu at night and drinks the nectar of the moon himself and becomes Rahu himself and eclipses the sun, protect me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)