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mahabharat 12.284.164: जिन योगात्मा परमेश्वर को नमस्कार है, ऐसे योगीजन, जिन्होंने निद्रा के वश में हुए बिना ही जीवन को जीत लिया है और जो सत्त्वगुण में स्थित हैं, वे ध्यान में प्रकाश का अनुभव करते हैं ॥164॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  12.284.164 
यं विनिद्रा जितश्वासा: सत्त्वस्था: संयतेन्द्रिया:।
ज्योति: पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नम:॥ १६४॥
 
 
अनुवाद
जिन योगात्मा परमेश्वर को नमस्कार है, ऐसे योगीजन, जिन्होंने निद्रा के वश में हुए बिना ही जीवन को जीत लिया है और जो सत्त्वगुण में स्थित हैं, वे ध्यान में प्रकाश का अनुभव करते हैं ॥164॥
 
Salutations to the Supreme Lord, the Yogatma, whom such yogis, who have conquered life without being under the influence of sleep and who are situated in Sattva Guna, experience the light in meditation. 164॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)