श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 134-136
 
 
श्लोक  12.284.134-136 
पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्।
गिरिको हिंडुको वृक्षो जीव: पुद्‍गल एव च॥ १३४॥
प्राण: सत्त्वं रजश्चैव तमश्चाप्रमदस्तथा।
प्राणोऽपान: समानश्च उदानो व्यान एव च॥ १३५॥
उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च।
लोहितान्तर्गता दृष्टिर्महावक्त्रो महोदर:॥ १३६॥
 
 
अनुवाद
आप पवित्रतम और परम शुभ हैं। आप गिरिक (अचेतन को चेतन करने वाले), हिन्दूक (चलने वाले), संसारवृक्ष, जीव, देह, श्वास, सत्व, रज, तम, अप्रमाद (स्त्रीविहीन - ऊपर की ओर जाने वाला), श्वास, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखों को खोलना और बंद करना), छींक और जम्हाई आदि हैं। आपकी अग्निमय लालिमायुक्त दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपका मुख और उदर महान हैं॥134-136॥
 
You are the purest of the pure and the most auspicious of all. You are Girik (the one who makes the unconscious conscious), Hinduk (the one who moves), the world tree, the living being, the body, the breath, the sattva, the rajas, the tamas, the apramad (the one without a woman – the upward sand), the breath, the apana, the samana, the udana, the vyana, the unmesh, nimesh (opening and closing the eyes), the sneezing and the yawning etc. Your fiery red coloured vision is hidden within. Your mouth and abdomen are great.॥134-136॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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