श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  12.284.133 
होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभु:।
त्रिसौपर्णं तथा ब्रह्म यजुषां शतरुद्रियम्॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
आप ही होत्र (स्रुवा), होता (होता), यज्ञोपवीत (आहुति), यज्ञ का अनुष्ठान (अनुष्ठान) और उसका फल देने वाले परमेश्वर हैं। वेद की त्रिसौपर्ण श्रुतियों में और यजुर्वेद के शतरुद्रिय प्रकरण में जो अनेक वैदिक नाम वर्णित हैं, वे सब आपके ही नाम हैं॥133॥
 
You are the Hotra (sruva), the Hota (hota), the material to be offered as sacrifices, the ritual of sacrifice and the Supreme Lord (who gives its results). The many Vedic names mentioned in the Trisauparna Shrutis of the Veda and in the Shatarudriya Prakarana of the Yajurveda are all Your names.॥133॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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