श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  12.284.116 
त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऽन्नभुगेव च।
अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्वभुक्पवनोऽनल:॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
आप अन्न हैं, अन्न के भोक्ता हैं, अन्न के दाता हैं, अन्न के पालनकर्ता हैं, अन्न के रचयिता हैं, पाचक हैं, अन्न के भक्षक हैं, प्राणवायु के स्वरूप हैं और जठराग्नि के कारक हैं ॥116॥
 
You are the food, the enjoyer of food, the giver of food, the follower of food, the creator of food, the digester, the eater of food, the form of vital air and the digestive tract. 116॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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