श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  12.284.115 
उन्मादन शतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज।
चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
आप जगत को मोह (मोह) में डालने वाले हैं। गंगाजी की सैकड़ों लहरें और भँवरें आपके सिर पर उठती रहती हैं। आपके केश सदैव गंगाजल से भीगे रहते हैं। आप ही चन्द्रमा को भी वृद्धि और क्षय के चक्र में डालने वाले हैं। आप ही युगों को दोहराने वाले और बादलों को आरंभ करने वाले हैं। आपको नमस्कार है॥ 115॥
 
You are the one who puts the world into madness (illusion). Hundreds of waves and whirlpools of Gangaji keep rising on your head. Your hair is always wet with Ganga water. You are the one who puts the moon into the cycle of waxing and waning. You are the one who repeats the ages and initiates the clouds. Salutations to you.॥ 115॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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