श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  12.284.11-12 
तान् दृष्ट्वा मन्युनाऽऽविष्टो दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ११॥
नायं यज्ञो न वा धर्मो यत्र रुद्रो न इज्यते।
वधबन्धं प्रपन्ना वै किं नु कालस्य पर्यय:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
(महामुनि दधीचि भी उस यज्ञ मंडप में उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि देवताओं, दानवों आदि की बहुत बड़ी सभा एकत्रित हुई है, किन्तु भगवान शिव दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनका आह्वान ही नहीं किया गया है। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ।) उन समस्त देवताओं को वहाँ उपस्थित देखकर दधीचि क्रोधित हो उठे और बोले, 'सज्जनों! जिसमें भगवान शिव की पूजा नहीं होती, वह न तो यज्ञ है और न ही धार्मिक अनुष्ठान। यह यज्ञ भी भगवान शिव के बिना यज्ञ कहलाने योग्य नहीं है। जिन लोगों ने इसका आयोजन किया था, वे मारे जाएँगे और कारागार में डाले जाएँगे। अहा! समय का कैसा चक्रव्यूह है!
 
(Mahamuni Dadhichi was also present in that yajna mandap. He saw that a large gathering of gods and demons etc. had gathered, but Lord Shiva was not visible. It seemed that he had not been invoked. This caused him great sorrow.) Seeing all those gods present there, Dadhichi became angry and said, 'Gentlemen! The one in which Lord Shiva is not worshipped is neither a yajna nor a religious ritual. This yajna is also not worthy of being called a yajna without Lord Shiva. The people who organised it are going to be killed and imprisoned. Oh! What a twist and turn of time it is.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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