श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक d1h-24
 
 
श्लोक  12.280.d1h-24 
(तं विद्धि भूतं विश्वादिं परमं विद्धि चेश्वरम्।)
रजस्तमश्च सत्त्वं च विद्धि नारायणात्मकम्।
सोऽऽश्रमाणां फलं तात कर्मणस्तत् फलं विदु:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उसे सम्पूर्ण सत्तारूप, इस जगत् का आदि कारण और ईश्वर समझो। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण - इन तीनों को नारायणमय समझो। तत्! वह समस्त आश्रमों का फल है। विद्वान पुरुष अपने समस्त कर्मों के फल को अपना ही मानते हैं।' 24॥
 
‘Consider him to be the complete form of existence, the original cause of this world and God. Rajogun, Tamogun and Sattvagun – consider these three as Narayanamay. Tat! He is the fruit of all the ashrams. Learned men consider the fruits of all their actions as theirs. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)