श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.28.6 
तेषामन्यतरापत्तौ यद् यदेवोपपद्यते।
तदस्य चेतनामाशु हरत्यभ्रमिवानिल:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इन दोनों में से एक या दूसरे की प्राप्ति अवश्य होती है; इसलिए जो भी सुख या दुःख आता है, वह मनुष्य के ज्ञान को उसी प्रकार हर लेता है, जैसे वायु बादलों को हर लेती है।
 
One or the other of these two is definitely attained; therefore whatever happiness or sorrow comes, it takes away the knowledge of a man in the same way as the wind takes away the clouds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)