श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.28.52 
नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित्।
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
किसी भी व्यक्ति को किसी के साथ एक स्थान पर सदैव रहने का अवसर कभी नहीं मिलता। जब कोई अपने ही शरीर के साथ बहुत समय तक सम्बन्ध में नहीं रह सकता, तो फिर किसी अन्य के साथ कैसे रह सकता है?॥ 52॥
 
No person ever gets the opportunity to stay with anyone in one place forever. When one cannot stay in a relationship with one's own body for a long time, then how can one stay with someone else?॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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