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श्लोक  12.28.4 
जनक उवाच
आगमे यदि वापाये ज्ञातीनां द्रविणस्य च।
नरेण प्रतिपत्तव्यं कल्याणं कथमिच्छता॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जनक बोले, 'ब्रह्मन्! जो व्यक्ति अपने कुल और धन का कल्याण चाहता है, उसे सृष्टि या विनाश के विषय में क्या निर्णय लेना चाहिए?'
 
Janaka said, 'Brahman! What should a person who wants the welfare of his family and wealth decide when it comes to creation or destruction?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)