श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.28.39 
नैवास्य कश्चिद् भविता नायं भवति कस्यचित्।
पथि संगतमेवेदं दारबन्धुसुहृज्जनै:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
इस आत्मा का न तो कोई सगा-संबंधी होगा, न ही इसका किसी से कोई संबंध होगा। जैसे मार्ग पर चलने वाले लोगों को अन्य यात्रियों का साथ मिलता है, वैसे ही यहाँ भाई, संबंधी, स्त्री, बच्चे और मित्र मिलते हैं ॥39॥
 
This soul will neither have any relative nor is it related to anyone. Just as the people walking on the road get company of other travellers, similarly here brothers, relatives, wives, children and friends meet. ॥ 39॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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