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mahabharat 12.28.16: जीवों को जो भी सुख या दुःख आता है, उसे वे सहने के लिए विवश हो जाते हैं, क्योंकि उससे बचने का कोई उपाय नहीं है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 28: अश्मा ऋषि और जनकके संवादद्वारा प्रारब्धकी प्रबलता बतलाते हुए व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.28.16 
सुखं वा यदि वा दु:खं भूतानां पर्युपस्थितम्।
प्राप्तव्यमवशै: सर्वं परिहारो न विद्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जीवों को जो भी सुख या दुःख आता है, उसे वे सहने के लिए विवश हो जाते हैं, क्योंकि उससे बचने का कोई उपाय नहीं है ॥16॥
 
Whatever happiness or sorrow comes to the living beings, they are forced to endure it because there is no way to avoid it. ॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)