श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  12.279.9-10 
यथाञ्जनमयो वायु: पुनर्मान:शिलं रज:।
अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जयन् दिश:॥ ९॥
तथा कर्मफलैर्देही रञ्जितस्तमसाऽऽवृत:।
विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जैसे श्याम वायु, मैनसिल के लाल-पीले चूर्ण में प्रवेश करके उसी के रंग से रंजित हो जाती है और सम्पूर्ण दिशाओं को रंगती हुई प्रतीत होती है, वैसे ही यह जीवात्मा, जो स्वभावतः रंगहीन, अज्ञान से आवृत और कर्मफल से रंगा हुआ है, एक ही रंग को धारण करके अर्थात् भिन्न-भिन्न शरीरों के धर्मों को ग्रहण करके समस्त प्राणियों के शरीरों में विचरण करता रहता है॥9-10॥
 
Just as the dark air, after entering the red-yellow powder of a mansil, gets colored with its color and appears to be coloring all the directions, in the same way, this living soul, which is naturally colourless, covered with ignorance and colored by the results of karma, keeps roaming in the bodies of all the living beings by adopting the same colour, i.e. by accepting the religions of different bodies. 9-10॥
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