श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.279.7 
न चापि मन्यसे राजन्नेष दोष: प्रसङ्गत:।
उद्योगादेव धर्मज्ञा: कालेनैव गमिष्यथ॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तुम जो यह मानते हो कि धन हानिकारक है क्योंकि वह आसक्ति का कारण है और मोक्ष में बाधक है, तुम्हारा यह मानना ​​उचित नहीं है, क्योंकि तुम सभी धर्म में पारंगत हो। शम, दम आदि के द्वारा स्वयं प्रयत्न करके तुम अल्पकाल में ही मोक्ष प्राप्त कर सकते हो।॥7॥
 
You who believe that wealth is detrimental because it is the cause of attachment and thus a hindrance to salvation, this belief of yours is not correct because all of you are well versed in Dharma. By making efforts yourself, by means of Shama, Dam etc., you can attain salvation in a short time. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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