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श्लोक 12.279.34  |
इतीदमुक्त: स मुनिस्तदानीं
प्रत्याह यत् तच्छृणु राजसिंह।
मयोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व-
मनन्यचित्त: सह सोदरीयै:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| राजासिंह! हे महापुरुष युधिष्ठिर! जब उन्होंने यह प्रश्न किया था, तब उस समय शुक्राचार्य ऋषि ने जो उत्तर दिया था, वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तुम अपने भाइयों के साथ ध्यान लगाकर उसे सुनो॥ 34॥ |
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| King Singh! Yudhishthira, the great man! When he asked this question, I am telling you the answer that the sage Shukrachary gave him at that time. You should listen to it with your brothers' attention. ॥ 34॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वॄत्र-गीताविषयक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७९॥
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