श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 279: ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र-संवादका आरम्भ  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.279.21 
तिर्यग् गच्छन्ति नरकं मानुष्यं दैवमेव च।
सुखदु:खे प्रिये द्वेष्ये चरित्वा पूर्वमेव ह॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जीव सुख-दुःख तथा प्रिय-अप्रिय विषयों में भटककर अपने कर्मानुसार नरक, स्वर्ग में मृत्यु, मनुष्य योनि या दिव्य योनि में जाते हैं ॥21॥
 
The living beings, after wandering through happiness and sorrow and favorite and unpleasant subjects, go to hell, death in heaven, human life or divine life according to their karma. 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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