वृत्र उवाच
सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं ह्यहम्।
न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम्॥ १६॥
अनुवाद
वृत्रासुर बोला, "हे ब्रह्मन्! सत्य और तप के बल से मैंने जीवों के आने-जाने का रहस्य निश्चित रूप से जान लिया है; इसलिए मैं इस पर न तो प्रसन्न हूँ और न ही शोक करता हूँ।"
Vritraasura said, "O Brahman! By the power of truth and austerity I have definitely understood the secret of the coming and going of the living beings; therefore I neither rejoice nor lament over it."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥