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mahabharat 12.278.20: उसे वानप्रस्थों और गृहस्थों का संग कभी नहीं करना चाहिए। जो वस्तु उपलब्ध हो, उसी की इच्छा करनी चाहिए, उसमें अपनी रुचि प्रकट नहीं करनी चाहिए और इच्छित वस्तु की प्राप्ति होने पर उसके मन में हर्ष का उद्गार नहीं होना चाहिए।॥20॥   |   mahabharat अध्याय 12.278: हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 278: हारीत मुनिके द्वारा प्रतिपादित संन्यासीके स्वभाव, आचरण और धर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.278.20 
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित्।
अज्ञातलिप्सं लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उसे वानप्रस्थों और गृहस्थों का संग कभी नहीं करना चाहिए। जो वस्तु उपलब्ध हो, उसी की इच्छा करनी चाहिए, उसमें अपनी रुचि प्रकट नहीं करनी चाहिए और इच्छित वस्तु की प्राप्ति होने पर उसके मन में हर्ष का उद्गार नहीं होना चाहिए।॥20॥
 
He should never have association with Vanaprasthas and Grihasthas. He should desire only that which is available without expressing his interest in it and there should not be an outburst of joy in his mind on getting the desired object.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)