श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 277: शरीर और संसारकी अनित्यता तथा आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषके कर्तव्यका निर्देश—पिता-पुत्रका संवाद  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  12.277.33-34h 
आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रज: पित:॥ ३३॥
आत्मयज्ञो भविष्यामि न मां तारयति प्रजा।
 
 
अनुवाद
पिता जी! मैं आत्मा से ही उत्पन्न हुआ हूँ। मैं स्वयं में स्थित हूँ। मेरी कोई संतान नहीं है। मैं केवल आत्म-यज्ञ का यज्ञकर्ता बनूँगा। संतान मुझे नहीं बचा सकती। 33 1/2।
 
Father! I have been born from the soul itself. I am situated in myself. I have no children. I will be the Yajnaman of the self-sacrifice only. Children cannot save me. 33 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)