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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 276: तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद
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श्लोक 7
श्लोक
12.276.7
यथैव शृङ्गं गो: काले वर्धमानस्य वर्धते।
तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते॥ ७॥
अनुवाद
जैसे बछड़े की आयु बढ़ने पर उसके सींग बढ़ जाते हैं, वैसे ही धन बढ़ने पर उसका लोभ भी बढ़ जाता है ॥7॥
Just as the horns of a calf grow with its growth in age, similarly, with the growth of wealth, its greed also increases. ॥ 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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