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mahabharat 12.276.5-6: जो लोग विवेकशील हैं, उन्हें तो अत्यंत सुखदायी पदार्थ भी दुःखमय प्रतीत होते हैं। किन्तु अज्ञानी को तो तुच्छ पदार्थ भी सदैव मोहित करते हैं। इस लोक में काम का सुख और स्वर्ग का दिव्य एवं महान सुख, दोनों ही कामना के अंत से प्राप्त सुख के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं। ॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 12.276: तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 276: तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.276.5-6 
अर्था: खलु समृद्धा हि बाढं दु:खं विजानताम्।
असमृद्धास्त्वपि सदा मोहयन्त्यविचक्षणान्॥ ५॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग विवेकशील हैं, उन्हें तो अत्यंत सुखदायी पदार्थ भी दुःखमय प्रतीत होते हैं। किन्तु अज्ञानी को तो तुच्छ पदार्थ भी सदैव मोहित करते हैं। इस लोक में काम का सुख और स्वर्ग का दिव्य एवं महान सुख, दोनों ही कामना के अंत से प्राप्त सुख के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हैं। ॥5-6॥
 
To those who are prudent, even the most prosperous objects seem to be full of sorrow. But to the ignorant even trivial objects always entice them. The pleasure of lust in this world and the divine and great pleasure of heaven, both are not even worth one-sixteenth of the pleasure that comes from the end of desire. ॥5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)