श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 276: तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.276.11 
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा शोकानन्दौ प्रियाप्रिये।
भयाभयं च संत्यज्य स प्रशान्तो निरामय:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वह सत्य-असत्य, हर्ष-शोक, प्रिय-अप्रिय, भय-अभाव आदि समस्त द्वन्द्वों को त्यागकर पूर्णतः शान्त एवं स्थिर हो जाता है ॥11॥
 
He abandons all the conflicts such as truth-falsehood, joy-sorrow, pleasant-dislikeful, fear-lack of awareness and becomes absolutely calm and composed. ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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