श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 276: तृष्णाके परित्यागके विषयमें माण्डव्य मुनि और जनकका संवाद  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  12.276.1-2 
युधिष्ठिर उवाच
भ्रातर: पितर: पौत्रा ज्ञातय: सुहृद: सुता:।
अर्थहेतोर्हता: क्रूरैरस्माभि: पापकर्मभि:॥ १॥
येयमर्थोद्भवा तृष्णा कथमेतां पितामह।
निवर्तयेयं पापानि तृष्णया कारिता वयम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! हम लोग बड़े पापी और क्रूर हैं। हमने धन के लिए अपने भाइयों, पिताओं, पौत्रों, कुटुम्बियों, मित्रों और पुत्रों का वध किया है। इसी धन के लोभ ने हमसे बड़े-बड़े पाप करवाए हैं। इस लोभ से हम कैसे मुक्त हो सकते हैं?॥1-2॥
 
Yudhishthira asked - Grandfather! We are very sinners and cruel. We have killed our brothers, fathers, grandsons, family members, friends and sons for the sake of money. This greed for money has made us commit big sins. How can we get rid of this greed?॥1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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