श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 274: मोक्षके साधनका वर्णन  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  12.274.18-19 
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम्।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थिति:॥ १८॥
एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमल: शुचि:।
तथा वाक्कायमनसां नियम: कामतोऽन्यथा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मूढ़ता और आसक्ति का अभाव, काम-क्रोध का त्याग और नम्रता, अहंकार और उत्तेजना से मुक्ति तथा मन की स्थिरता तथा निष्काम भाव से मन, वाणी और इन्द्रियों का संयम - यही मोक्ष का स्वच्छ, शुद्ध और पवित्र मार्ग है ॥18-19॥
 
Absence of foolishness and attachment, renunciation of lust and anger and humility, freedom from arrogance and excitement and stability of mind and control of mind, speech and senses with selflessness - this is the clean, pure and sacred path of salvation. 18-19॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगाचारानुवर्णनं नाम चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगसम्बन्धी आचारका वर्णन नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)