अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम्।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थिति:॥ १८॥
एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमल: शुचि:।
तथा वाक्कायमनसां नियम: कामतोऽन्यथा॥ १९॥
अनुवाद
मूढ़ता और आसक्ति का अभाव, काम-क्रोध का त्याग और नम्रता, अहंकार और उत्तेजना से मुक्ति तथा मन की स्थिरता तथा निष्काम भाव से मन, वाणी और इन्द्रियों का संयम - यही मोक्ष का स्वच्छ, शुद्ध और पवित्र मार्ग है ॥18-19॥
Absence of foolishness and attachment, renunciation of lust and anger and humility, freedom from arrogance and excitement and stability of mind and control of mind, speech and senses with selflessness - this is the clean, pure and sacred path of salvation. 18-19॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगाचारानुवर्णनं नाम चतु:सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २७४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगसम्बन्धी आचारका वर्णन नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥