श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.269.7 
गृहस्थ एव यजते गृहस्थस्तप्यते तप:।
गार्हस्थ्यमस्य धर्मस्य मूलं यत्किंचिदेजते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ ही यज्ञ करता है और गृहस्थ ही तपस्या करता है। मनुष्य जो भी चेष्टा करता है, जो भी शुभ कर्म करता है, उस धर्म का मूल कारण गृहस्थ जीवन ही है। ॥7॥
 
It is the householder who performs sacrifices and it is the householder who performs tapasya. Whatever efforts a man makes, whatever auspicious deeds he performs, the root cause of that Dharma is the household life. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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