श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 61-62
 
 
श्लोक  12.269.61-62 
एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां प्रवृत्तिषु।
एकमालम्बमानानां निर्णये सर्वतोदिशम्॥ ६१॥
आनन्त्यं वदमानेन शक्तेनावर्जितात्मना।
अविज्ञानहतप्रज्ञा हीनप्रज्ञास्तमोवृता:॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमों के कर्मों में संलग्न मनुष्य केवल एक ही सुख का आश्रय लेते हैं और उसे प्राप्त करना चाहते हैं। उनमें भी हम जैसे लोग अज्ञान से मोहित, तुच्छ विषयों में लगे हुए और तमोगुण से आवृत हैं। आप तर्क करने में समर्थ और कुशल हैं, अतः मोक्षरूपी सुख की अनंतता को सर्वव्यापी सिद्धान्त बताकर आपने हमारे मन में शांति प्रदान की है ॥61-62॥
 
In this way, people involved in the activities of the four Varnas and Ashramas take refuge in only one happiness and want to achieve it. Among them, people like us are bewildered by ignorance, are engaged in trivial matters and are covered with Tamoguna. You are capable and skilled in reasoning, hence by telling us the infinity of the happiness of salvation as a universal principle, you have brought peace to us in your mind. ॥ 61-62॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas