श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  12.269.56 
एवं ध्यात्वानुपश्यन्त: संत्यजेयु: शुभाशुभम्।
परां गतिमभीप्सन्तो यतय: संयमे रता:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विचार करके परम गति की इच्छा रखने वाले संयमी यति शुभ और अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओं का त्याग कर देते हैं ॥56॥
 
The self-controlled yeti who wish to attain ultimate speed, after thinking in this way, abandon both auspicious and inauspicious things. 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)