श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.269.22 
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यत:।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिण:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मारूप में स्थित हैं और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्मा ही मानते हैं, जिनकी कोई विशेष स्थिति नहीं है, ऐसे ज्ञानी पुरुष के पदचिन्हों को जो लोग खोजते हैं, उनके मार्ग में देवता भी भ्रमित हो जाते हैं ॥22॥
 
Those who seek the footsteps of the wise man who is situated in the form of the soul of all beings and who looks at all creatures as the soul only, who has no specific status, even the gods who try to trace his movements get bewildered on the path. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)