श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.269.2 
निर्द्वन्द्वा निर्नमस्कारा निराशीर्बन्धना बुधा:।
विमुक्ता: सर्वपापेभ्यश्चरन्ति शुचयोऽमला:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वे शीत और उष्णता के द्वन्द्वों से विचलित नहीं होते। वे न तो किसी को प्रणाम करते हैं और न ही आशीर्वाद देते हैं। इतना ही नहीं, ये विद्वान पुरुष कामनाओं के बंधनों से भी नहीं बँधे होते। वे सभी पापों से मुक्त, शुद्ध और निर्मल होकर सर्वत्र विचरण करते हैं॥ 2॥
 
They are not disturbed by the conflicts of cold and heat. They neither bow to anyone nor give blessings. Not only this, these learned men are not bound by the shackles of desires. They roam everywhere being free from all sins, pure and clean.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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