श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.269.16 
एवं क्रोशत्सु वेदेषु कुतो मोक्षोऽस्ति कस्यचित्।
ऋणवन्तो यदा मर्त्या: पितृदेवद्विजातिषु॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जब वही वैदिक मन्त्र बार-बार यह घोषित करते हैं कि मनुष्य जन्म से ही देवताओं, पितरों और ऋषियों के ऋणी हैं, तो फिर गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन ऋणों को चुकाए बिना कोई मोक्ष कैसे प्राप्त कर सकता है?॥16॥
 
When the same Vedic mantras repeatedly declare that human beings are indebted to gods, forefathers and sages right from their birth, then how can anyone attain salvation without repaying those debts while living as a householder?॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)