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mahabharat 12.267.23: सत्यवान ने कहा, "पिताजी! यदि आप डाकुओं को न मारकर साधुओं की रक्षा करने में असमर्थ हैं, अथवा यदि आप अहिंसा द्वारा डाकुओं को साधु बनाकर उनके प्राण नहीं बचा सकते, तो भूत, वर्तमान और भविष्य में उनके आध्यात्मिक लाभ को ध्यान में रखते हुए, किसी अच्छे उपाय से उनकी डाकुओं की प्रवृत्ति का अंत कर दीजिए।"   |   mahabharat अध्याय 12.267: द्युमत्सेन और सत्यवान‍्का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.267.23 
सत्यवानुवाच
तान् न शक्नोषि चेत् साधून् परित्रातुमहिंसया।
कस्यचिद् भूतभव्यस्य लाभेनान्तं तथा कुरु॥ २३॥
 
 
अनुवाद
सत्यवान ने कहा, "पिताजी! यदि आप डाकुओं को न मारकर साधुओं की रक्षा करने में असमर्थ हैं, अथवा यदि आप अहिंसा द्वारा डाकुओं को साधु बनाकर उनके प्राण नहीं बचा सकते, तो भूत, वर्तमान और भविष्य में उनके आध्यात्मिक लाभ को ध्यान में रखते हुए, किसी अच्छे उपाय से उनकी डाकुओं की प्रवृत्ति का अंत कर दीजिए।"
 
Satyavan said, "Father, if you are unable to protect the saints by not killing the robbers, or if you cannot save the lives of the bandits by converting them into saints through non-violence, then keeping in mind their spiritual benefits in the past, present and future, put an end to their banditry by some good means." 23.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)