श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 267: द्युमत्सेन और सत्यवान‍्का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.267.17 
द्युमत्सेन उवाच
यत्र यत्रैव शक्येरन् संयन्तुं समये प्रजा:।
स तावान् प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घॺते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
द्युमत्सेन ने कहा, "बेटा! जहाँ कहीं भी प्रजा को वश में करके धर्म की सीमा में रखा जा सके, वहाँ ऐसा करना धर्म माना जाता है। जहाँ तक धर्म का उल्लंघन न हो (वहाँ ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए)॥17॥
 
Dyumatsena said, "Son! Wherever the people can be controlled and kept within the limits of religion, doing so is considered to be Dharma. As long as Dharma is not violated (such arrangements should be made there).॥ 17॥
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