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श्लोक 12.265.14  |
भीष्म उवाच
यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्मजी बोले - युधिष्ठिर ! मनुष्य को इस प्रकार कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए कि शरीर का बल सर्वथा क्षीण न हो जाए, जिससे वह मृत्यु के अधीन न हो जाए; क्योंकि शरीर के बलवान होने पर ही मनुष्य धर्म का पालन कर सकता है ॥14॥ |
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| Bhishmaji said – Yudhishthir! One should be engaged in actions in such a way that the strength of the body does not become completely weakened, so that it does not become subject to death; Because a man can follow religion only when his body is strong. 14॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि विचख्नुगीतायां पञ्चषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें विचख्नुगीताविषयक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६५॥
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