श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 264: जाजलिको पक्षियोंका उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.264.17 
किं तस्य तपसा कार्यं किं वृत्तेन किमात्मना।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह तपस्या से क्या चाहता है? वह अपने आचरण या आत्मचिंतन से किस उद्देश्य की सिद्धि करना चाहता है? यह पुरुष श्रद्धावान है। वह जैसी सात्त्विक, राजसिक या तामसिक श्रद्धा रखता है, वैसी ही उसकी प्रकृति भी सात्त्विक, राजसिक या तामसिक होती है।॥17॥
 
‘What does he want from tapasya? What purpose is he trying to achieve through his conduct or self-reflection? This man is full of faith. According to the Sattvik, Rajasik or Tamasik faith he is, so is his Sattvik, Rajasik or Tamasik nature.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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